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About ALAL or अल्ल in Kshatriya Swarnkar Community

अल्ल क्षत्रिय स्वर्णकार परिवारों में क्यों जरूरी है इस पर पहले की मैगजीन्स में बहुत कुछ लिखा जा चुका है जिसको अध्ययन करके संक्षिप्त में यह बता सकते है कि अल्ल आपके एक घर होने की पहिचान है। मैंने वेबसाइट में ALAL  जब उसे किया तो उसको मैंने इंग्लिश मीनिंग के एक्रोनिम के साथ इस्तेमाल किया।  एक ही अल्ल में विवाह न होने की परंपरा कितनी वैज्ञानिक है कि हमारे समाज में हमारे पूर्वजो ने यह भी ध्यान रखा है कि भविष्य में भी किसी भी घर में आपस में भाई और बहिन में आपस में सम्बन्ध न हो सके और परिवार आनुवंशिक बीमारियों से बचा रहे।  आज के वैज्ञानिक युग में भी यह कितना फिट है इसका अंदाजा सभी लगा सकते है।  फुल फॉर्म ऑफ़ ALAL = ( A ncestral L ineage A llelic L ink)  यह बिलकुल फिट हो रहा है और अल्ल की मूल भावना के अनुरूप है।  मंच के सदस्यों की जानकारी के लिए प्रेषित। 

Akhil Bhartiya Kshatriya Swarnkar Vikas Manch-Journey from 2021-2025

 सभी पाठक जनो को बहुत बहुत साधुवाद, यदि आप ब्लॉग पोस्ट पढ़ रहे है तो सबसे पहले हमारा अभिवादन स्वीकार करे।  समाज का अंग होने के कारण स्वाभाविक है जो सामाजिक समस्याएं है उनके लिए कुछ कार्य किया जाए, मेरे मन में सबसे पहले यह प्र्श्न आया कि जब आज सभी लोग छोटी बड़ी बातो को जानने के लिए गूगल का इस्तेमाल करते है तो स्वाभाविक है सभी समाज के लोग भी कुछ न कुछ सर्च जरूर करते होंगे। मैंने भी सर्च करके देखा लेकिन कुछ उपयोगी वेबसाइट नहीं दिखाई दी। अल्ल जैसी जानकारी तो विल्कुल भी नहीं थी।  कुछ सामाजिक संघठनो के समय भी दिया पर अपनापन महसूस नहीं हुआ और इसने ही मुझे जाग्रत किया कि क्षत्रिय स्वर्णकारों के लिए एक वेबसाइट होना जरूरी है। 2021 में इस आईडिया का जन्म हुआ और मैंने अपने बिजी समय में से कुछ समय निकालकर सबसे पहले abksvm.in वेबसाइट बनायीं और मंच का नाम दिया "अखिल भारतीय क्षत्रिय स्वर्णकार विवाह मंच" और फेसबुक पर प्रमोशन के लिए सभी स्टेट के पेज बनाये और लोगो तो अपनी बात पहुचायी। दिसंबर 2023 तक मंच की सदस्यता पूर्ण रूप से निशुल्क राखी गयी।  31-12-2023 के बाद मंच की सर्विसेस को लेने क...

Knowledge Article by Shree Triloki Nath Ji Verma

मनुस्मृति के अनुसार, ब्राह्मणः क्षत्रियो, वैश्य त्रयो वर्ण द्विजातयः। चतुर्थ एक जाति शूद्र अस्ति, नस्ति तु पंचमः।। अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीन वर्ण द्विज कहलाते हैं तथा चैथी एक जाति शूद्र है। इसके अलावा पांचवीं जाति कोई नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि स्वर्णकार उपरोक्त चार में से ही कोई एक जाति का है।                                              (मनुस्मृति अध्याय 10 श्लोक 4) स्वर्ण का कार्य करने वाला स्वर्णकार कहलाता है। अर्थात् स्वर्णकार कोई वर्ण या जाति नहीं कही जा सकती है। किन्तु आज जब वर्ण का स्थान जाति ने ले लिया तो व्यवसाय का चयन स्वेच्छा न रहकर वंशानुगत हो गया है। व्यवसाय या कार्य के आधार पर जाति संगठन गठित हुए हैं। एक प्रकार से संकुचित दायरा बनने का यह एक मुख्य कारण है।   स्वर्णकार शब्द की यात्रा: स्वर्णकार शब्द का ऐतिहासिक क्रम खोजने पर ज्ञात होता है कि मानवोत्पŸिा से लेकर ईशा की चैथी शताब्दी तक का सफर इस शब्द को निम्न प्रकार करना पड़ा। वैदिक साह...

Kshatriya Swarnkar Samaj-Purpose of Blog

क्षत्रिय स्वर्णकार समाज के बारे में यह कहना उचित होगा कि समाज के लोग मुख्यता स्वर्णकारी व्यवसाय से जुड़े हुए है और अपने पूर्वजो के वास्तविक पहिचान को साथ में और पहले लिखकर अगली पीढ़ी तक इस बात को पंहुचा रहे है कि किसी काल खंड में पूर्वज क्षत्रिय रहे है |  समाज के बहुत से लोग परंपरा से पूर्ण रूप से अवगत भी नहीं है | यह ब्लॉग बनाने का उद्देश्य यही है कि समाज से सम्बंधित ज्ञान अगली पीढ़ी तक टेक्नोलॉजी के माध्यम से आगे लाया जाता रहे | यहाँ पर समय समय पर उचित आर्टिकल्स प्रकाशित किये जाते रहेंगे और लोगो का समाज के प्रति ज्ञान वर्धन भी किया जाता रहेगा | गोपाल सोलंकी